श्रावण मास में रूद्रीपाठ एवं रूद्राभिषेक

श्रावण मास में रूद्रीपाठ एवं रूद्राभिषेक

सभी विघ्नों का निवारक रूद्रीपाठ

आज से श्रावण मास का शुभारंभ हो चुका है। इस विशेष अवसर पर समस्त प्राणियों को हार्दिक शुभकामनाएं और मैं भगवान आशुतोष शशांक शेखर रूद्र रूप परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वो समस्त चराचर पर अपनी कृपा बनाएं रखें व सबके लिए मंगलकारी बनें। श्रावण मास भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है इसलिए हमारे सनातन धर्म परंपरा में शिवलिंग के अभिषेक की अवधारणा है क्योंकि शिवलिंग अपने आप में शक्ति का अधिष्ठान है। शिवलिंग स्वयं शक्तिपुंज है। प्राचीन काल में बहुत से राजघरानों के आराध्य देव भगवान शिव रहे हैं। महाराष्ट्र में मराठा साम्राज्य के आराध्य देव भगवान शिव ही हैं और वाराणसी के तो घर घर में शिव विराजमान होते थे। पारद शिवलिंग पर अभिषेक करना लाखों गुणा पुण्यदायी होता है। परन्तु पारद शिवलिंग हर स्थान पर उपलब्ध नहीं होते हैं।
जो व्यक्ति श्रावण मास में लिंगेश्वर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं, उन्हें सब ओर से मांगलिक समाचार प्राप्त होते हैं, विशेषकर रूद्रीपाठ के साथ अभिषेक करने से प्राप्त होने वाले पुण्य दस गुणा से हजार गुणा तक बढ़ जाते हैं। इसी कारण लोग अपने घर और औद्योगिक क्षेत्र में रूद्रीपाठ, लघुरूद्र, महारूद्र और अतिरूद्र आदि अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं। भगवान शिव अतिशीघ्र प्रसन्न होते हैं इसलिए उनको आशुतोष कहा गया है। आशुः = शीघ्र , तोष = प्रसन्न होना, सन्तुष्ट होना। अतः शिव शीघ्रातिशीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्त को यथेष्ठ वर प्रदान करते हैं। हमारे सनातन संस्कृति में गंगादि पवित्र नदियों के जल से अभिषेक करने की परंपरा है। इसलिए भक्तगण श्रावण माह में पवित्र नदियों से पैदल चलकर जल लाकर अभिषेक करते हैं

समृद्धि दायक रूद्राभिषेक

भगवान शिव का पूजन, रुद्रपाठ जीवन की समस्त समस्याओं का निवारण करने में समर्थ है। अतः अधिकारी स्वयं करें या वेदविद् ब्राह्मण से शतरुद्रीयम् करवाएं —
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संतानहीनता, शाकिनी आदि दोष, ग्रहों का दोष, ज्वर आदि समस्त रोग निवारण यह सब रूद्र अर्चन से समाप्त हो जाते हैं –
“अनपत्यत्वदोषेषु शाकिन्यादि ग्रहेषु च ।
सर्वज्वर विनाशाय रुद्रो जाप्यो न संशयः ।। रोगवान्पापवांश्चैव रुद्रं जप्त्वा जितेन्द्रियः ।
रोगात् पापात् प्रमुक्तोऽसावतुलं सुखमश्नुते” इति ।। वायुपुराणे

शिवलिंग का अर्चन, रुद्री पाठ एकादशी व्रत और वाराणसी में प्राण त्याग यह चारों मुक्ति के साधन दिए गए हैं-
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“लिङ्गार्चनं रुद्रजाप्यं तथा चैकादशीव्रतम् ।
* वाराणस्यां च मरणं मुक्तिरेषा चतुर्विधा ।।॥स्मृतिमहार्णवे

रुद्र अर्चन और रुद्री पाठ से किए हुए ज्ञात अज्ञात समस्त पाप, ब्रह्म हत्यादि पाप समाप्त हो जाते हैं। इसलिए पाप क्षय हेतु, रोग निवारण के लिए, लक्ष्मी प्राप्ति, शांति, पुष्टि, आयुवृद्धि, आरोग्य और मोक्ष के लिए रुद्र का अर्चन और रूद्र पाठ करना प्रशस्त है –
अग्निदाहात्सुरापानाद् दुष्कृत्याचरणात्तथा । मुच्यते ब्रह्महत्याया इति कैवल्यशाखिनः” ।

“तदेतद्रुद्रार्चनं पापक्षयार्थी व्याधिविमोचनार्थी श्रीकामः शान्तिकामः पुष्टिकाम आयुष्काम आरोग्य-कामो मोक्षकामञ्च कुर्यात्” इति ।

सभी पाप क्षय के लिए रुद्री पाठ सर्वश्रेष्ठ साधन बताया गया है-
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“यः शतरुद्रियमधीते सोऽग्निपूतो भवति, स सुरापानात्पूतो भवति, स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति, स ब्रह्महत्यायाः पूतो भवति, स कृत्याकृत्यायाः पूतो भवति, तस्माद्विमुक्तमाश्रितो भवति, अत्याश्रमी सर्वदा सकृद्वा जपेत् -कैवल्योपनिपदि।

कामनाओं की पूर्ति के लिए विशेष द्रव्य

शिवपुराण में लिंगस्वरूप शिव का विभिन्न द्रव्यों से अभिषेक करने का अलग- अलग फल बताया गया है।शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा।
श्लोक
जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै
दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै।
मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।
पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।।
बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा यांगना।
जवरप्रकोपशांत्यर्थम् जलधारा शिवप्रिया।।
घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्।
तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः।
प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम।
केवलं दुग्धधारा च वदा कार्या विशेषतः।
शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्।
श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!!
सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह!
पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।।
जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै।
पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेतिछवं तथा।
महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा।
कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्।
अर्थात
जल से रुद्राभिषेक करने पर — वृष्टि होती है।
कुशा जल से अभिषेक करने पर — रोग, दुःख से छुटकारा मिलता है।
दही से अभिषेक करने पर — पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।
गन्ने के रस से अभिषेक करने पर — लक्ष्मी प्राप्ति होती है।
मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि होती है।
तीर्थ जल से अभिषेकक करने पर — मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इत्र मिले जल से अभिषेक करने से — बीमारी नष्ट होती है ।
दूध से अभिषेक करने से — पुत्र प्राप्ति, प्रमेह आदि रोगों की शान्ति तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
गंगाजल से अभिषेक करने से — ज्वर ठीक हो जाता है।
शर्करा मिश्रित दूध से अभिषेक करने से — सद्बुद्धि प्राप्ति होती है।
घी से अभिषेक करने से –– वंश विस्तार होता है।
सरसों के तेल से अभिषेक करने से – रोग तथा शत्रु का नाश होता है।
शुद्ध शहद से रुद्राभिषेक करने से —- पाप क्षय होता है।
इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व रूप सत्यं शिवम सुन्दरम् का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद से समृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति के साथ-साथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।
वागार्थविव सम्पृक्तौ वागार्थ प्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।।

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